मध्यस्थ कतर पर हमला, सऊदी को लेकर पाकिस्तान से बैर… घातक रास्ते पर चल पड़ा ईरान
अमेरिका से जंग के बीच ईरान की मिसाइलें अब उन देशों तक पहुंच रही हैं जो अब तक उसके लिए बातचीत का रास्ता खोल रहे थे. कतर नाराज है, पाकिस्तान दबाव में है और सऊदी को लेकर नई तनातनी हो गई है. सवाल यह है कि क्या ईरान अपने दुश्मनों से लड़ते-लड़ते अपने दोस्तों संग भी दुश्मनी मोल ले रहा है?

किसी भी जंग में दो तरह के देश होते हैं. एक वो जो हथियार उठाते हैं. दूसरे वो जो बातचीत की मेज सजाते हैं. पश्चिम एशिया की मौजूदा लड़ाई में कतर, ओमान और पाकिस्तान ऐसे ही देश थे, जो अमेरिका और ईरान के बीच कम्युनिकेशन बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है.
ईरान आखिर चाहता क्या है?
रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान पूरे खाड़ी क्षेत्र को यह मैसेज देना चाहता है कि अगर उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई होगी तो उसका असर सिर्फ अमेरिका या इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की उसकी कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.ईरान चाहता है कि इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाज उसकी शर्तों के मुताबिक चलें. लेकिन इसी रणनीति का दूसरा पहलू भी है.
क्या ईरान खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है?
कई पश्चिमी और खाड़ी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय ईरान की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अमेरिका नहीं है. असल चुनौती यह है कि उसके कुछ ऐसे साझेदार भी दूरी बना रहे हैं, जो हालिया जंग में उसके लिए मध्यस्थ की भूमिका में थे. कतर अमेरिका संग सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर रहा है. पाकिस्तान दोहरे दबाव में है. ओमान की भूमिका ईरान के खिलाफ होती दिख रही है. सऊदी पहले से ही ईरान के खिलाफ खड़ा है.
ईरान आखिर चाहता क्या है?
रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान पूरे खाड़ी क्षेत्र को यह मैसेज देना चाहता है कि अगर उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई होगी तो उसका असर सिर्फ अमेरिका या इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की उसकी कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.ईरान चाहता है कि इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाज उसकी शर्तों के मुताबिक चलें. लेकिन इसी रणनीति का दूसरा पहलू भी है.
क्या ईरान खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है?
कई पश्चिमी और खाड़ी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय ईरान की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अमेरिका नहीं है. असल चुनौती यह है कि उसके कुछ ऐसे साझेदार भी दूरी बना रहे हैं, जो हालिया जंग में उसके लिए मध्यस्थ की भूमिका में थे. कतर अमेरिका संग सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर रहा है. पाकिस्तान दोहरे दबाव में है. ओमान की भूमिका ईरान के खिलाफ होती दिख रही है. सऊदी पहले से ही ईरान के खिलाफ खड़ा है.
फिलहाल इतना साफ है कि अमेरिका और इजरायल से टकराव के बीच ईरान की हर नई कार्रवाई सिर्फ युद्ध का दायरा नहीं बढ़ा रही, बल्कि उसके कूटनीतिक विकल्प भी कम करती जा रही है. यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ईरान अगली मिसाइल कहां दागेगा. असली सवाल यह है कि अगर बातचीत कराने वाले देश ही उससे नाराज हो गए, तो कल तेहरान के लिए बातचीत की मेज कौन सजाएगा?









